कुछ लोग ऐसे भी : शीला डिमरीजी

मैं उनके बारे में क्या कहूँ ? वैसे आजकल ऐसे भी लोग होते हैं क्या? कई बार जब उनकी याद आती है तब मैं सोचने पर मज़बूर हो जाती हूँ |

शायद आप भी उनसे मिले होंगे. अगर आप इंदौर शहर में ऑटो चलाते हो , तो हो सकता है कि उन्होंने आपकी गाडी में सवारी की हो और आपसे अपने मधुर अंदाज़ में पूछा हो , “भैय्याजी क्या आप कुछ मीठा खाएंगे?” या फिर खुद अपने हाथोंसे फल काटके आपको खिलाया हो .

ऐसा कितनी बार हुआ है की वह पूँछे मुझसे , क्या श्रीलेखा आप कुछ खाओगी ? अरे ,आपकी बिंदी देखो टेडी होगयी है, चलिए बैठिये में ऑय लाइनर लगाके देती हूँ .

कई बार सोचा है मैंने , यह औरत ऐसी कैसी है! कैसे वह हर किसी के बारे में सोच पा रही हैं. हर किसी का दर्द और सुख वह कैसे अपना कर प् रही हैं. क्या है इसका राज़?

अच्छा ऐसा भी कई बार हुआ है की वह मेरे या किसी और दोस्त के पास जाके पूँछी हो, बताओ कुछ मदद करूँ. अच्छा डिक्टेट करके दूँ. चलो कोई बात नहीं, अगली बार जब भी ज़रुरत हो , मुझे बुलाना. उसमे क्या है, मुझे तो मदद करना अच्छा लगता है.

मतलब आप उनसे मदद लेने से मना भी करो वह बुरा नहीं मानती.

हाँ मैं अपनी दोस्त और पूर्वे सहकार्यकर्ता शीलाजी कि ही बात कर रही हूँ. मुझे पता है, एक बार आप उनसे मिलेंगे तो आप भी मेरी इस राय से सहमत होंगे.

शीलाजी, अपनी बड़ी बिंदी, काजल से सजी बड़ी बड़ी आँखें और अपनी मुस्कान हमेशा कायम रखियेगा. बहुत हिम्मत देती है यह.

अब आप सोचेंगे मैं कैसे हिंदी में लिखने लगी, यह तो ववव.ीसीहिंदीटीपिंग.कॉम का कमाल है.

गलतियों के लिए माफी मांगती हूं और नीलिमा व्यास जी ,आप मेरी भाषा कि चूक को अनदेखा कर देना. अपूर्वा आप भी !

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